A Mother's Day ! Never Let it Go

 खटिया पर पड़े पड़े बड़े सुकून से मोबाइल की स्क्रीन को स्क्रोल करता जा रहा था | स्क्रीन को देखते हुए मन में एक शांति सी आती जा रही थी। चलो देर ही सही, मगर जो एक आज की जनरेशन की बहुत बड़ी समस्या थी, वो कम से कम खत्म तो हुई। ऐसा लग रहा था कि मानो देश में फिर से राम राज्य वापस गया है।

शेर और
हिरण एक घाट पर पानी पी रहे हैं। सभी नेता ईमानदार हो गए हैं, सभी अफसर अब गरीबों को देखते ही उनसे आग्रह कर रहे हैं कि आप क्यों आए हो, हमें एक फोन ही कर देते, हम आपके घर पर आकर के समस्या सुनते। मानो आई इस आई  ने लोगों से माफी मांगकर शांति का पैगाम भेजा है।

जैसे
कौआ भी कोयल की वाणी बोल रहा हो और ये सब देखकर मैं एक गहरी नींद में डुबता जा रहा था। और सोच रहा था चलो अच्छा हुआ, अब कोई मां ब्रद्धाश्रम में नहीं है, अब सभी बुजुर्ग अपने नाती-पांतीयों के साथ खेल रहे हैं, उनकी आंखों में एक अलग सी चमक है। नहीं समझे अरे भाई 3 दिन पहले जब मदर्स डे आया था माँ को तो छोड़ो बहुओं ने अपने सासू माँ के साथ फ़ोटो खींचे थे।

भाई
 साहब ऐसा लग रहा था कि ये सब ज़मीनी हक़ीक़त है, मगर ये सब मेरा भ्रम था। उपरोक्त चीज़ें कभी ठीक नहीं हो सकतीं। जूकरबर्ग चाचा की पैदा की हुए फेसबुक और इंस्टा या बोलो मेटा वर्स थानुस की तरह राज करने की सोच रहे हैं|  वही चल रहा है। ज़मीन पर हक़ीक़त कुछ और ही है, मगर ज़मीन पर आज के समय पर देख कौन रहा है , ज़मीन पर चल क्या रहा है। बारिश के मौसम में तो चींटी भी उड़ती है, मगर हम आज की जनरेशन सोशल मीडिया पर उड़ रहे हैं। भैया हमें हेलीकॉप्टर की तो पता है कि उड़ता है, मगर साइकिल जो हमारी सबसे पुरानी साथी थी वो धीरे-धीरे छूट गई क्योंकि हमें अब उड़ना है बस। ये तो हमारे संविधान में भी लिखा हुआ है कि सबको अपनी ज़िंदगी जीने का हक़ है, हाँ है, बिल्कुल है।

वेस्टर्न
कल्चर जो हावी हुआ है, जिसमें पति, पत्नी और वो नहीं, वो का मतलब गलत मत लो, वो मीन्सबच्चे” हैं बस और कोई नहीं। हमें लगता है की फ्यूचर तो गांव से बहार जाकर ही बनेगा की घर पर | बच्चे के फ्यूचर के चक्कर में हम न जाने क्या क्या गलती कर रहे है | एक उम्र का दूसरी उम्र से कनेक्शन होता है एक जो पौधा उग रहा है नयी नयी कोपल फुट रही है दूसरा जो गिरने के कगार पर है मगर वो देख रहा है की नयी कोपल फुट गई है | उसको देखकर खुस हो रहा है में गिर जाऊँ तो फ़िक्र नहीं अब है न कोपल |

मगर हम पढ़ाई और भविस्य के नाम पर उस कोपल को गिरते हुए पेड़ से दूर कर देते है | क्युकी हम जवान होते है और जवानी तो दीवानी होती है उसे सिर्फ जवान ही चाहिए| फिर चाहे वो दोस्त हो या पत्नी, जो भी हो मगर बुढ़ापा ढलता हुआ सूर्य है उसकी तैयारी हो गई है जाने की, मगर वो खुस है उस उगते हुए सूर्य की लालिमा को देखकर जो उसके आँगन में अभी अभी उतरी है |

बृद्ध चेहरे की झुर्रीयो को जैसे सहला रही है | मगर हमने फ्यूचर और पढ़ने के नाम पर उस बृद्ध वृक्ष का साया नहीं पड़ने दिया | और आज की पढ़ाई का तो ये आलम है
कि 3 किलो का बच्चा 13 किलो का बस्ता फिर सरकार को बीच में आना पड़ा कि नहीं, 6 साल से पहले बच्चे को 1st क्लास में नहीं कर पाएंगे, हाँ मगर अपने सुकून के लिए मैडमों ने तोड़ निकाल लिया, प्ले स्कूल में जाएगा, मेरा बेटा सेंट पीटर्स में जाएगा, इंग्लिश बोलेगा आज का समय वो है, संस्कार जाए तो जाए मगर इंग्लिश बोलना चाहिए | खेर एक बार को सोचो तुम लोग हिंदी मध्यम से पढ़कर संस्कार नहीं सीख पाए तो उससे उम्मीद करना तो बेकार है वो फिर भी इंग्लिश मध्यम जा  रहा है |

वो
भी मदर्स डे पर मेली मम्मी मेला अभिमान नाम का ट्रेंड चलाएगा । जैसे हम मंगलवार को मंदिर जाते हैं, वैसे ही मदर्स डे पर माँ के पास, फादर्स डे पर पिता के पास जाते हैं। जैसे शादी में कुछ लाफंगे लड़के 500-500 के नोटों की गड्डी को लेकर दूल्हा के पास जाकर फ़ोटो खिंचाते हैं और जब बैंड वाला लेने आता है, तो 20 मिनट उस पर खेल करवाते हैं, फिर पीछे की जेब में से चुपके से 20 रुपये का नोट लेकर के उसे दे देते हैं। हमारे रिश्ते ऐसे ही होते जा रहे हैं... अभी की जनरेशन फिर भी ठीक है, मगर सोचो आने वाले समय में रिश्तों का क्या होगा।







ऋषि शर्मा

Comments

Popular posts from this blog

मेरे रिजल्ट की रात